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मजदूर की परिभाषा क्या है ? आखिर 1 मई को ही क्यों मनाया जाता है लेबर डे ?
May 2, 2020 • विशेष प्रतिनिधि

भारत में 1 मई के दिवस को सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाया गया था। उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित कर लिया गया था। इसकी शुरूआत भारती मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी।

1 मई के दिन को विश्व के अधिकांश देशों ने मेहनतकश श्रमिकों के नाम पर समर्पित कर रखा है। इसे मई दिवस, मे डे, मजदूर दिवस, अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस आदि तमाम तरह के अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत में श्रमिक दिवस पहली बार 1 मई सन् 1923 को मनाया गया था। तब भारतीय मजदूर किसान पार्टी ने मद्रास में इसे जोरशोर से मनाया था। आज विश्व के 80 से अधिक देश में "अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस" के दिन राष्ट्रीय अवकाश रखकर उस दिन को मजदूरों के नाम समर्पित किया जाता है। विश्व के कुछ देशों में इसे अलग-अलग तारीखों में भी मनाये जाने का चलन है।
 
मजदूर कौन हैं-
 
बेहद सरल शब्दों में व्याख्या करें तो देश में कोई भी ऐसा व्यक्ति जो अपनी श्रम शक्ति को बेचकर रोजगार प्राप्त करके अपना जीवन यापन करता है तो वह एक मजदूर है। वैसे हमारे देश में औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) की परिभाषा के अनुसार यह फैसला किया जाता है कि कौन मजदूर है। औद्योगिक विवाद अधिनियम के दफा 2 (एस) में मजदूर की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है-
 
“मजदूर (प्रशिक्षु समेत) कोई भी ऐसा व्यक्ति है जो मजदूरी या वेतन के बदले, किसी उद्योग में शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, कार्यकारी, क्लर्क या सुपरवाइज़र का काम करता हो, चाहे काम की शर्तें स्पष्ट या अन्तर्निहित हों वह मजदूर है।"
 
श्रमिक दिवस को क्यों मनाया जाता है-
 
आज अधिकांश देश 1 मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं, लेकिन हकीकत में यह अमेरिका में मजदूर के विद्रोह और शहादत का दिवस है। 1 मई के इतिहास पर जब हम नजर डालते हैं तो पता चलता है कि 1 मई 1886 के दिन‌ विश्व के कुछ ताकतवर देशों के मजदूरों ने अपने-अपने कारखानों के मालिकों के खिलाफ सड़कों पर उतर कर विद्रोह का बिगुल बजा दिया था, वो काम-धंधा छोड़कर जगह-जगह में सड़कों पर हड़तालों पर बैठ गए थे।
 
उस दौरान अमेरिका के कल-कारखानों में काम करने वाले मजदूरों ने भी काम के घंटे कम करके आठ घंटे करने व अपनी अन्य लंबे समय से लम्बित मांग को लेकर काम बंद करके हड़ताल शुरुआत कर दी थी। अभी हड़ताल शुरू हुए चार दिन भी पूरे नहीं हुए थे, कि 4 मई 1886 को अमेरिका के शिकागो के हे-मार्केट में एक बम धमाका हो गया। अपनी मांगों को लेकर देश में मजदूर पहले से ही सड़कों पर उतरे हुए थे। उसके चलते पूरे देश में हड़ताल से जबरदस्त हड़कंप मचा हुआ था। इस धमाके ने अमेरिकी प्रशासन का धैर्य पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया था और वह मजदूर के प्रति उग्र हो गया।
 
हे-मार्केट धमाके का यह मामला शिकागो, इलिनोइस, संयुक्त राज्य अमेरिका में आम हड़ताल के दौरान हुआ था, जिसमें आम मज़दूर, कारीगर, व्यापारी और अप्रवासी लोग तक भारी संख्या में शामिल हुए थे। पुलिस द्वारा गोली चलाए जाने और मेकॉर्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी संयंत्र में चार हड़तालियों मजदूरों को मार डालने की एक घटना के बाद, अगले दिन जब हे-मार्केट स्क्वायर में एक विशाल रैली का आयोजन किया गया। यह रैली शांतिपूर्ण रही, लेकिन रैली के अंत में, जैसे ही पुलिस कार्यक्रम को तितर-बितर करने के लिए आगे बढ़ी, तभी एक अज्ञात हमलावर ने पुलिस की भीड़ पर एक बम फेंक दिया। इस बम धमाके के परिणामस्वरूप बाद में पुलिस कार्यवाही में पुलिस ने प्रदर्शनकारी मजदूरों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। बताया जाता है‌ कि इस गोलीबारी में दर्जनभर से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई थी। इसके बाद दहशत का माहौल पूरे देश में फैल गया था। कई दिनों तक मजदूरों की नाराजगी के चलते देश के अधिकांश कल-कारखाने बंद रहे थे।
 
इन दंगों ने सात पुलिसकर्मियों की भी जान ले ली थी। जिस मामले में बाद में अमेरिका में एक बेहद सनसनीखेज़ ट्रायल चला, जिसमें आठ प्रतिवादियों की खुलेआम सुनवाई, जो कि उनकी राजनैतिक मान्यताओं को लेकर हुई, ना कि किसी बम विस्फोट में शामिल होने के लिए सुनवाई की गई। जांच के अंत में उनमें से चार लोगों को सरेआम फांसी दे दी गई थी। बाद में हे-मार्केट स्कवायर की यह घटना, दुनिया भर के मजदूर वर्ग के लोगों को जबरदस्त ढंग से आक्रोशित करने का बहुत बड़ा कारण बनी थी। लेकिन कुछ दिनों में धीरे-धीरे समय ने लोगों के जख्म भर दिये और सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो गया। हालांकि इस घटना के बाद कल-कारखानों के प्रबंधकों ने मजदूरों की बहुत सारी मांगों को मान लिया था। कम्पनियों में आठ घंटे की शिफ्ट की शुरुआत यही से हुई थी। उसके बाद पेरिस में सन् 1889 में फिर से एक बार मजदूर इकट्ठा हुए थे। जिस कार्यक्रम को "अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन" का नाम दिया गया था। इसमें पहली बार 1886 के मई महीने में जान गंवाने वाले मजदूरों को याद करते हुए 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का फैसला किया गया था। उसके बाद के वर्षों में, "हे-मार्केट शहीदों" की स्मृति को विभिन्न देशों में भी "मई दिवस" के रूप में याद किया जाने लगा। बाद में धीरे-धीरे मजदूरों ने 1 मई को खुद-ब-खुद छुट्टी मनानी शुरू कर दी। इसके बाद मजदूरों संगठनों के दबाव में धीरे-धीरे विश्व के सभी प्रमुख देशों को 1 मई को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना पड़ा। हालांकि असल में वह कौन शख्स था जिसने 1 मई को मजदूर दिवस मनाने की पेशकश की थी, इसका आज तक पता नहीं चल पाया है, वैसे माना जाता है कि यह एक सर्वसम्मति से लिया गया फैसला था। इसके बाद खुद-ब-खुद पूरी दुनिया के मजदूर इससे जुड़ते चले गए थे।
 
भारत में श्रमिक दिवस का इतिहास-
 
भारत में 1 मई के दिवस को सब से पहले चेन्नई में 1 मई 1923 को मनाया गया था। उस समय इस को मद्रास दिवस के तौर पर प्रामाणित कर लिया गया था। इसकी शुरूआत भारती मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने शुरू की थी। जिन्होंने भारत में मद्रास के हाईकोर्ट सामने एक बहुत बड़ा प्रदर्शन किया और एक संकल्प पास करके यह सहमति बनाई थी कि इस दिवस को भारत में भी कामगार दिवस के तौर पर मनाया जाये और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाये। आज भारत समेत लगभग 80 देशों में यह दिवस 1 मई को मनाया जाता है। इसके पीछे सभी का तर्क है कि यह दिन "अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस" के तौर पर अब सम्पूर्ण विश्व में प्रामाणित हो चुका है।
 
देश में मजदूरों की स्थिति-
 
भारत में अभी भी मजदूरों के लिए सरकार व औधोगिक घरानों को बहुत काम करने की आवश्यकता है। हमारी सरकारों को अभी भी विचार करना होगा कि किसी भी लोक कल्याणकारी सरकार एवं राष्ट्र का, लोगों की सामाजिक सुरक्षा, न्याय एवं जीने का अधिकार प्रथम कानूनी उद्देश्य होना ही चाहिए। बाकी बातें उसके बाद शुरू होती है लेकिन हम अपने देश की बात करें तो यह सवाल अभी तक पूर्ण रूप से देश में लागू नहीं है, बल्कि बहुत लम्बे समय से विचारणीय है, विशेषकर मजदूरों के नजरिये से बात करें तो स्थिति अभी तक उनके हित में ठीक नहीं है। हमारे देश में भी मजदूर खुश तो देश खुश के सिद्धांत पर जल्द से जल्द अमल करना होगा, तब ही देश विकास के नित नए आयाम स्थापित करके विश्व गुरु बन सकेगा।
 
अभी हाल के दिनों में देश में मजदूरों की स्थिति की बात करें तो स्थिति बहुत चिंताजनक है, लॉकडाउन के चलते दुविधा में फंसा मजदूर बहुत ज्यादा परेशान है। देश में जबसे कोरोना वायरस संक्रमण से बचने के चलते लॉकडाउन लगा है, तब से संगठित व असंगठित हर तरह के क्षेत्र के मजदूरों के सामने विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गयी है। मजदूरों की रोजीरोटी दोनों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। पैसे के अभाव में अलग-अलग शहरों में बड़ी संख्या में फंसे दिहाड़ी मजदूर तो बेचारे भूखे मरने के कगार पर हैं, रोटी व राशन के लिए वो बेचारे देश के भामाशाहों, सरकार व स्वयंसेवी संस्थाओं के ऊपर पूर्ण रूप से निर्भर हो गये हैं। 
 
लॉकडाउन में जिस तरह से अपने ही देश में कामगारों की जन शक्ति वाले अथाह जन समूह को राज्यों की सरकारों व कुछ ताकतवर जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों के द्वारा उपेक्षा का शिकार होकर, उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के चलते, आपदा के समय में उनको अपने राज्य के मजदूर व प्रवासी मजदूर का दर्जा देकर आपस में बांट दिया गया, यह स्थिति आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था व खुशहाली के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। 
 
हमारे देश के नीति-निर्माताओं को समझना होगा कि किसी भी संस्था, उद्योगों और देश के निर्माण में मज़दूरों, कामगारों और मेहनतकशों लोगों की बहुत ही अहम भूमिका होती है। वह लोग उसकी कामयाबी के लिए रात-दिन एक करके जुटे रहते हैं। किसी भी उद्योग में कामयाबी के लिए मालिक, सरमाया, कामगार और सरकार एक बहुत अहम धड़े होते हैं। किसी भी देश में मजदूरों की शक्ति के बिना कोई भी औद्योगिक व अन्य प्रकार का ढांचा खड़ा नहीं रह सकता है।
 
हम लोगों को समय रहते यह समझना होगा कि मजदूर का मतलब केवल लाचार व गरीब से नहीं होता है, मजदूर हमारे समाज की वह महत्वपूर्ण ईकाई हैं, जिसका हमारी अधिकांश सफलता के पीछे अनमोल योगदान होता है। वह हमारे सिस्टम का एक बेहद महत्वपूर्ण अभिन्न अंग हैं, आज उसके बिना किसी भी तरह के कार्य को सम्पन्न करने की उम्मीद करना एकदम बेमानी है। हमको समझना होगा कि एक ईंटों का बोझ उठाने वाला इंसान, मिट्टी के गारे में या सीमेंट के मसाले में सना इंसान हो, हमारे ऑफिस की फाइलों के बोझ तले दबा एक कर्मचारी हो, टाई लगाकर कर ऑफिस में काम करने वाला क्लर्क हो, सूट पहनकर कारखाने आने वाला सिनियर सुपरवाइजर हो, या हर वो इन्सान जो किसी संस्था के लिए काम करता है और बदले में पैसे लेता है, वो असल में तो एक मजदूर ही है। तो फिर आपस में एकजुटता की जगह एकदूसरे की अनदेखी क्यों?
 
जिस तरह से लॉकडाउन में असुरक्षा के भाव के चलते मजदूर महानगरों से अपना बोरिया बिस्तर समेट कर वापस अपने घरों की तरफ निकल पड़े हैं, वह स्थिति कोरोना संक्रमण के मद्देनजर तो ठीक है ही नहीं, बल्कि आने वाले समय में इसके दूरगामी परिणाम देश की अर्थव्यवस्था पर नजर आ सकते हैं। देश में जिस तरह की आज हालात है उसको देखकर लगता है कि आने वाले समय में देश के अधिकांश महानगरों में मजदूर मिलने में बेहद कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। देश में मजदूरों का पलायन यह दर्शाता है कि कहीं ना कहीं देश के सिस्टम व सरकारी तंत्र पर मजदूरों को विश्वास नहीं था।
 
हमारे सिस्टम के ताकतवर लोगों को ध्यान रखना होगा कि दिल्ली में बैठकर बनी योजनाएं मजदूर तक पहुंचते-पहुंचते अपना कल्याणकारी मुख्य स्वरूप नहीं खो पायें। उन योजनाओं का लाभ देश के मजदूर वर्ग को वास्तव में धरातल पर मिलता नजर आना चाहिए। ना कि यह योजनाएं केवल सरकारी खजाने से मजदूरों के हितों के नाम पर पैसा निकाल कर उसकी बंदरबांट का जरिया बनकर रह जायें। देशहित व मजदूरों के हित में चलने वाली सभी योजनाओं के दूरगामी समृद्धि के प्रयास धरातल पर नजर आने चाहिए, ना कि यह योजनाएं सिर्फ हमारे सिस्टम की फाइलों की शोभा मात्र बन कर रह जायें। आज हमारे देश के नीति-निर्माताओं को ध्यान रखना होगा कि सरकारी खजाने से जो पैसा मजदूर को मिला रहा है उसका वास्तव में सदुपयोग हो रहा है या नहीं। क्योंकि भ्रष्टाचार के चलते जिस तरह की स्थिति बन गयी है उस समय यह आज का सबसे ज्वलंत सवाल है। आज समय की मांग है कि हम अपने मजदूर भाईयों का अच्छे से ध्यान रखें उनको लाचार व मजबूर ना बनने दें, क्योंकि उनकी लाचारी और मजबूरी हम सभी पर बहुत भारी पड़ सकती है, इसलिए ध्यान रखें "मजदूर खुश तो देश खुशहाल" रहेगा।